UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 4 जातक-कथा

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name जातक-कथा
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 4 जातक-कथा

अवतरणों का सन्दर्भ अनुवाद

उलूकजातकम् (उल्लू विषयक जातक-कथा)

Jatak Katha Class 12 (1)
अतीते ……………………………………………… इत्यवोचन् । [2013,17]

ततः शकुनिगणाः …………………………………………. इत्यवोचन् ।
अतीते प्रथमकल्पे …………………………………………….. इति उक्तवन्तः ।

[ जातक = जन्म। जातक कथा = भगवान बुद्ध के पूर्वजन्मों की कथाएँ, जिनमें उन्होंने बुद्धत्व-प्राप्ति के लिए विभिन्न शीलों का अभ्यास किया था। अभिरूपम् = सुन्दर। सर्वाकारपरिपूर्णम् = समस्त सुलक्षणों से युक्त। चतुष्पदाः = पशु। सन्निपत्य = एकत्रित होकर। शकुनिगणाः = पक्षी। पुनरन्तरे (पुनः +
अन्तरे) = किन्तु (हमारे) बीच। ]

सन्दर्भ-यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘जातक-कथा’ पाठ के ‘उलूकजातकम्’ शीर्षक से उद्धृत है।
अनुवाद–प्राचीन काल के प्रथम कल्प में मनुष्यों ने एक सुन्दर, सौभाग्यशाली एवं समस्त सुलक्षणों से युक्त पुरुष को राजा बनाया। चौपायों (पशुओं) ने भी इकट्टे होकर एके सिंह को राजा बनाया। तब पक्षियों ने हिमालय प्रदेश में एक शिलातल पर इकड़े होकर कहा-“मनुष्यों में राजा दीख पड़ता है, वैसे ही चौपायों में भी, किन्तु हमारे बीच कोई राजा नहीं है। राजा के बिना रहना ठीक नहीं। (हमें भी) किसी को राजा के पद पर नियुक्त करना चाहिए। तब उन्होंने (राजा की खोज में) एक-दूसरे पर दृष्टि दौड़ाते हुए एक उल्लू को देखकर कहा ‘यह हमको पसन्द है।”

जातक कथा कक्षा 12 (2)
अथैकः शकुनिः ……………………………………………… कृत्वा अगमन् ।

अथैकः शकुनिः ……………………………………………………… इत्याह ।
अर्थकः शकुनिः …………………………………………………….. धक्ष्यामः ।

[ आशयग्रहणार्थम् = मत (राय) जानने के लिए। त्रिकृत्वः = तीन बार। अवयत् = सुनाया (अर्थात् घोषित किया कि उल्लू को राजा बनाने में किसी को आपत्ति हो तो कहे)। तप्तकटाई = गर्म कड़ाही में। प्रक्षिप्ताः तिलाः इव =डाले गये तिलों के सदृश। धक्ष्यामः = भुन जाएँगे। विरुवन् = चिल्लाता हुआ। उदपतत् = उड़ गया। एनमवधावत (एनम् + अन्वधावत्) = इसके पीछे दौड़ा।]

सन्दर्भ-पूर्ववत्।
अनुवाद-इसके बाद एक पक्षी ने सबका मत जानने के लिए तीन बार सुनाया (घोषणा की)। तब एक कौआ उठकर बोला-“जरा ठहरो, इसका राज्याभिषेक के समय ही ( अर्थात् इस अतीव हर्ष के अवसर पर ही) ऐसा (भयानक) मुख है तो क्रुद्ध होने पर कैसा होगा ? इसके क्रुद्ध होकर देखने पर तो हम लोग गर्म कड़ाही में डाले गये तिलों की तरह जहाँ-के-तहाँ ही जल-भुन जाएँगे। ऐसा राजा मुझे अच्छा नहीं लगता। तुम लोगों का इस उल्लू को राजा बनाना मुझे ठीक नहीं लगता। इस समय के क्रोधहीन मुख को ही देखो, क्रुद्ध होने पर यह कैसा (विकृत) हो जाएगा ?” वह ऐसा कहकर ‘मुझे अच्छा नहीं लगता’, ‘मुझे अच्छा नहीं लगता’ चिल्लाता हुआ आकाश में उड़ गया। उल्लू ने भी उठकर उसका पीछा किया (या उसके पीछे भागा)। तब से ही दोनों एक-दूसरे के वैरी बन गये। पक्षी भी सुवर्ण हंस को राजा बनाकर चले गये।

नृत्यजातकम् (नृत्य-सम्बन्धी जातक-कथा)

Class 12 Hindi Sanskrit Chapter 4 (1)
अतीते प्रथमकल्पे ……………………………………………… इत्यकथयत् ।

हंसराजः तस्यै …………………………………………………… इत्यभाषत ।।
अतीते ………………………………………………………. इत्यवोचत् । [2013]
अतीते ……………………………………………. दुहितरमादिदेश । [2018]
अतीते प्रथमकल्पे ……………………………………………. संन्यपतत् ।।
सा शकुनिसह्ये …………………………………………………………. इत्यकथयत् । [2010]

[वरमदात् (वरम् + अदात्) = वर दिया। आत्मनश्चित्तरुचितम् (आत्मनः + चित्त + रुचितम्) = अपना मनपसन्द (मनोनुकूल)। वृणुयात् = वरण करे। मणिवर्णग्रीवम् = नीलमणि के रंग की गर्दन वाले। चित्रप्रेक्षणम् = रंग-बिरंगे पंखों वाले। लज्जाञ्च (लज्जाम् + च) = और लज्जा को। प्रतिच्छन्न = बिना ढका (नंगा)। बर्हाणाम् = पंखों को। समुत्थाने = उठाने में। न अस्मै = इसे नहीं। गतत्रपाय = लज्जाहीन को (त्रपा = लज्जा), नष्ट हो गयी है लज्जा जिसकी वह, निर्लज्ज। ]

सन्दर्भ–यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के जातक-कथा’ पाठ के नृत्यजातकम्’ शीर्षक से अवतरित है।
अनुवाद-प्राचीन काल में प्रथम कल्प में चौपायों (पशुओं) ने सिंह को राजा बनाया। मछलियों ने आनन्द मत्स्य (मछली) को एवं पक्षियों ने सुवर्ण हंस को (राजा बनाया)। उस सुवर्ण राजहंस की पुत्री हंसपोतिका (हंसकुमारी) अत्यधिक रूपवती थी। उस (हंसराज) ने उसे (हंसकुमारी को) वर दिया कि वह अपने मनोनुकूल पति का वरण करे। हंसराज ने उसे वर देकर हिमालय के पक्षियों के समुदाय को इकट्ठा कराया। विभिन्न प्रकार के हंस, मोर आदि पक्षीगण आकर एक विशाल शिलातल पर इकट्टे हुए। हंसराज ने पुत्री को
आदेश दिया कि (वह) आकर अपने मनपसन्द पति को चुने। उसने पक्षी समुदाय पर दृष्टि डालते हुए नीलमणि के रंग की गर्दन और रंग-बिरंगे (या विचित्र) पंखों वाले मोर को देखकर कहा कि यह मेरा स्वामी हो।’ मोर ने (यह कहते हुए कि) “आज भी तुम मेरा बल नहीं देखती हो’ (अर्थात् अभी तुमने मेरा पराक्रम देखा ही कहाँ है ?), बड़े गर्व से निर्लज्जतापूर्वक उस बड़े पक्षी समुदाय के बीच पंख फैलाकर नाचना शुरू किया और नाचते हुए नग्न हो गया। सुवर्ण राजहंस ने लज्जित होकर कहा-“इसे तो न (अन्दर का) संकोच है और न ही पंखों को उठाने में (बाहर की) लज्जा। इस निर्लज्ज को मैं अपनी पुत्री नहीं दूंगा।” यह मेरी पुत्री से विवाह योग्य नहीं है।

जातक कथा का हिंदी अनुवाद (2)
हंसराजः ……………………………………….. अगच्छत् ।

[तदैव = उसी। परिषन्मध्ये (परिषत् + मध्ये)= सभा के बीच। भागिनेयः = भांजा। भागिनेयाय = भांजे के लिए।].

सन्दर्भ-पूर्ववत्।।
अनुवाद-हंसराज ने उसी परिषद् के बीच अपने भांजे हंसकुमार को पुत्री दे दी। मोर हंसपुत्री को न पाकर लजाकर उस स्थान से भाग गया। हंसराज भी प्रसन्न मन से अपने घर को चला गया।

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